Saturday, November 14, 2015

काश आप होते ... पापा




"काश उन बाहों का घेरा आज भी होता,
काश उन हाथों का स्पर्श आज भी होता,
जिन बाँहों में आते ही हर चेहरे पे आती किलकारी,
जिसकी मुस्कान लगती हर बचपन को प्यारी,
काश उन बाहों का घेरा आज भी होता |

जैसे हमें ऊँगली पकड़ के चलना सिखाया,
जैसे हमारे हर नखरे और नाज़ों को उठाया,
कभी प्यार से तो कभी गुस्से से समझाया,
फिर बड़े लाड़ से गले से लगाया,
काश उन बाहों का घेरा आज भी होता |

पापा... काश आप होते,
काश आपकी बाहों का घेरा होता,
आपका लाड़ होता, प्यार होता,
सिर्फ उसके लिए ही नहीं ..
मेरे लिए भी ...
काश आप होते.. आपका प्यार होता .. आपका साथ होता"


Saturday, October 31, 2015

माँ का फ़ोन आया

माँ के लिए नया फ़ोन लिया, आम सी बात है, इसमें क्या ख़ास.. हाँ शायद मेरे लिए नहीं क्यूंकि आज कल हम या यूँ कहूं की हमारी नयी generation गैजेट फ्रीक हो गई है.. वक़्त से ज़्यादा तेज़ भागते इस गैजेट वर्ल्ड में हर रोज़ एक नया स्मार्ट फ़ोन आता है, रोज़ नए मॉडल्स, नए फीचर्ज़, नयी एपलिकेशंस और उस पर तेज़ी से दौड़ती हमारी उँगलियाँ.. हमें तो आदत है इन सब की, लेकिन माँ... माँ को नहीं, उनके लिए तो ये स्मार्ट फोन जैसे जादू था, नज़रें उसमें पता नहीं क्या क्या ढूँढना चाहती थी| बड़ी स्क्रीन, टच पैड इतना सेंसटिव जैसे मक्खन. 

इस नए फ़ोन के पहले भी एक फ़ोन था, वो भी स्मार्ट फ़ोन ही कहा जा सकता है पर इस नए वाले से कम स्मार्ट. वो बेचारा थोडा स्लो था, उसकी याद्दाश्त भी थोड़ी कमज़ोर थी और हाँ स्क्रीन भी छोटी थी उसकी| माँ को उस फ़ोन के साथ जद्दोजहद करते देख कर एहसास हुआ की आँखें कमज़ोर
हो गई हैं और माँ वक़्त से पहले, उम्र से थोड़ी ज्यादा बूढ़ी| तो क्या हुआ अगर वक़्त और ज़माना इतनी तेज़ी से भाग रहा है तो, माँ के लिए तो जैसे वक़्त उसी दिन थम गया था जब पापा ने उन्हें इस स्मार्ट फोन की दुनिया में अकेला छोड़ दिया था. वो पुराना स्मार्ट फ़ोन उनका ही दिया था जिसे हमने रिटायर्ड हर्ट करार दे दिया था| खैर बात जहाँ से शुरू की थी वहीँ लिए चलती हूँ, नया स्मार्ट फ़ोन ..माँ के लिए. अब अजिसे छोटे बच्चे के लिए एक नया खिलौना कौतुहल का विषय होता है, ये नया स्मार्ट फोन भी माँ के लिए ऐसा ही था| वो इससे खेलना तो चाहती थी लेकिन डरती थीं की कहें कुछ ख़राब हो गया तो, वैसे ये डर उनके मन में बिठाने का श्रेय भी हमें ही जाता है, क्यूंकि उन्हें नए फ़ोन के बारे में कुछ ज्यादा पता नहीं था और हमने तो जैसे उसपे phd कर रखी थी.. 
“अरे मम्मी क्या बटन दबा दिया”, “ओह्हो.. पूछ तो लिया होता पहले की कैसे अप्प यूज़ करनी है”.. वगेरह वगेरह. 

कहानी यहीं से शुरू होती है. ये जो नया फ़ोन आया था उसमें पहले तो whats app इनस्टॉल किया, फिर फेसबुक और कई सारी और apps. अरे हाँ, फेसबुक पर अभी नया नया प्रोफाइल बनाया उनका, सारे घरवालों को ऐड किया, बाकि के तामझाम पूरे किये और बनाया प्रोफाइल|

फ़ोन पे भी इनस्टॉल किया  और कर दिया हवाले स्मार्ट फोने माँ के. धीरे धीरे ही सही पर माँ के हाथ फ़ोन पे सेट होने की कोशिश कर रहे थे, पर शायद दिमाग और हाथ साथ नहीं दे रहे थे एक दुसरे का. उनको इन सबके बीच में तालमेल बिठाना ही था और ये करते मैं उन्हें बौहुत ध्यान से देख रही थी. आखिर ये नयी नयी apps, ये फेसबुक इन सबके बीच हमने ही उन्हें फंसाया था, और अब आपके चहरे पे ये सवाल की लकीरें की हमने....? तो जी हाँ .. हमनें. हम बच्चों ने.

हमने हमारे आस पास इस सोशल साइट्स का ऐसा जाल बना लिया की हमारे पेरेंट्स अपने आपको बड़ा अलग अलग महसूस करते, हम उनके बीच बैठते और हाथ में फ़ोन पे चैटिंग और फेसबुकिंग करते. जब वो कुछ पूछते तो जवाब ये होता कि “अरे आपको कैसे पता होगा ये तो फेसबुक पे है” या फिर “अरे वो एक्चुअली whats app पे है न ये पिक” और ऐसी बौहुत सी बातें जो जाने अनजाने उन्हें ये एहसास दिलाती की शायद वो इस दौड़ में कहीं पीछे रह गए हैं और बच्चे काफी आगे, और फिर जिस प्रेशर से कभी कभी teenagers गुज़रते हैं उसी से हमारे पेरेंट्स को भी गुज़रना पड़ता है जो हमारी समझ से थोडा सा परे है | फिर वही होता है जो वो नहीं चाहते, इस सोशल मीडिया के जाल में फंसना, उन्हें तो सीधी सादी ज़िन्दगी पसंद है जहाँ उनका परिवार हो और खुशियाँ हों, लेकिन जो जाल हमने अपने इर्द गिर्द बुना है वो अब धीरे धीरे हमारे पेरेंट्स को भी जकड़ रहा है|


हालात तब और ख़राब हो जाते हैं जब हम अपने ही माँ डैड की प्रोफाइल्स फेसबुक पे बनाते हैं और फिर उन्हें ही ऐड करने से पहले 10 बार सोचते हैं, क्यूँ .. ये तो मैं भी नहीं जानती .!! पर उन्हें ये बात कितनी खलती होगी ये समझ नहीं पाते, कदम कदम पे वो सवाल करते और हम लम्बी लम्बी साँसें लेकर उन्हें ऐसे समझाते हैं जैसे आज तक की सारी पढाई तो हमें पड़ोसियों ने कराइ और सवालों के जवाब तो सिर्फ टीचर्स ने ही दिए हों. 

इन सारी बातों के बीच मैं ये नहीं कहती की सारे पेरेंट्स ऐसे ही होते हैं या ये नयी technology यूज़ करना गलत है पर कहीं न कहीं
हम हमारे पेरेंट्स से उनकी आज़ादी उनसे छीन रहे हैं, और उन्हें अपने साँचें में ढाल रहे हैं जो शायद गलत है. 


खैर अब तो माँ ने फ़ोन के साथ सामंजस्य बिठाना शुरू कर दिया है, सब कुछ सीख भी रही हैं पर कहीं न कहीं उनके कुछ पूछने के लिए बढ़ते हाथ और सवाल सुन के मुझे अन्दर से गिल्ट फील होता है की हमने उनकी सिंपल सी लाइफ को कितना complicated बना दिया है.


वैसे माँ का फ़ोन है बौहुत स्मार्ट
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